बालोद टाइम्स
बालोद। एक पिता के कलेजे को चीर देने वाली पीड़ा जब समाज की सुरक्षा का संकल्प बन जाए, तो वह न केवल प्रेरणा देती है बल्कि सैकड़ों जानें भी बचाती है। बालोद के संजयनगर निवासी शैलेंद्र शर्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है। लगभग 10 वर्ष पूर्व बिच्छू के डंक से अपनी चार वर्षीय मासूम बेटी प्रगति को खोने वाले शैलेंद्र ने उस दर्द को अपनी ढाल बनाया और प्रण लिया—अब किसी और माँ की गोद बिच्छू के डंक से सूनी नहीं होने देंगे।

आज 27 जुलाई की तारीख भले ही शैलेंद्र के लिए एक न भरने वाला ज़ख्म हो, लेकिन वे हर साल इस दिन को बिच्छू के डंक से बचाव के प्रति जनजागरूकता फैलाने के रूप में मनाते हैं। इस अभियान में अब उनकी छोटी बेटी मोक्षा भी कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दे रही है।
एक भयावह शाम जिसने छीन लीं खुशियां
घटना वर्ष 2016 की है। शाम के वक्त बिजली गुल थी और शैलेंद्र अपनी बेटी प्रगति को बाहर घुमाने ले जाने की तैयारी कर रहे थे। मासूम प्रगति ने जल्दीबाज़ी में जैसे ही अपनी जूती में पैर डाला, अंदर मौजूद बिच्छू ने उसे डंक मार दिया। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही मासूम ने दम तोड़ दिया। जिस बेटी को पिता हंसते-खेलते घुमाने ले जाने वाले थे, उसकी निष्प्राण देह लेकर घर लौटना उनके लिए असहनीय दुख था।

पीएम और स्वास्थ्य मंत्री से बेहतर इलाज की गुहार
इस हादसे के बाद शैलेंद्र टूटे नहीं, बल्कि उन्होंने बिच्छू के डंक से होने वाली मौतों को रोकने के लिए आवाज़ उठाई। वे लगातार मांग कर रहे हैं कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी-वेनम (Anti-venom) दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता और बेहतर इलाज के पुख्ता इंतजाम हों। इस संदर्भ में वे प्रधानमंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भी पत्र लिख चुके हैं।
बेटी की याद में रोपा नीम का पौधा आज बन चुका है विशाल वृक्ष
प्रगति के निधन के बाद उसके जन्मदिन पर शैलेंद्र ने तालाब के पास एक नीम का पौधा लगाया था, जिसे वे अपनी बेटी का ही रूप मानते हैं। 10 वर्षों की देखभाल के बाद आज वह पौधा एक विशाल पेड़ बन चुका है। शैलेंद्र हर वर्ष बेटी की पुण्यतिथि और जन्मदिन पर वहां जाकर दीप जलाते हैं और जल अर्पित कर उसे नमन करते हैं।

पोस्टर के जरिए घर-घर पहुंचा रहे सावधानी का संदेश
पिछले एक दशक से शैलेंद्र अपने स्वयं के खर्च पर पोस्टर छपवाकर बाजारों, स्कूलों, दुकानों और सार्वजनिक स्थानों पर बांट रहे हैं। वे लोगों को खासकर मानसून के समय सावधानी बरतने की सलाह देते हैं:
जूते-चप्पल पहनने से पहले अच्छी तरह झाड़कर देखें।
अंधेरे में हमेशा टॉर्च या रोशनी का इस्तेमाल करें।
घर के आसपास और कोनों में साफ-सफाई बनाए रखें।
डंक मारने की स्थिति में झाड़-फूंक के चक्कर में पड़े बिना तुरंत अस्पताल पहुंचें।
शैलेंद्र शर्मा का यह निरंतर प्रयास साबित करता है कि इंसान चाहे तो अपनी सबसे बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी को भी समाज-सेवा के अटूट संकल्प में बदल सकता है।


