बालोद। शहर की शांत फिजा के बीच धर्मांतरण के आरोपों ने माहौल को गरमा दिया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि बालोद शहर के कुछ चिन्हित इलाकों में हर रविवार को प्रार्थना सभाओं के नाम पर लोगों को बहलाने-फुसलाने का काम किया जा रहा है। इस मामले को लेकर अब प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
चिन्हित इलाकों में गतिविधियां तेज
जानकारी के अनुसार, शहर के संस्कारशाला मैदान के पीछे स्थित वार्डों सहित गंजपारा मोड़ के आसपास के क्षेत्रों में ऐसी गतिविधियों की चर्चा तेजी से फैल रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां नियमित रूप से प्रार्थना सभाएं आयोजित की जा रही हैं, जिनमें बाहरी लोगों की आवाजाही भी बढ़ी है। आरोप है कि इन सभाओं के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
“प्रार्थना सभा” के नाम पर बहलाने-फुसलाने का आरोप
सूत्रों का कहना है कि कुछ समूह कथित तौर पर आर्थिक या अन्य प्रकार के प्रलोभन देकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन क्षेत्र में इसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
पत्रकारिता के दुरुपयोग का भी आरोप
इस पूरे मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है कि कुछ लोग पत्रकारिता के माध्यम का उपयोग कर अपने प्रभाव को बढ़ाने और गतिविधियों को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह मीडिया की साख के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।
सामाजिक संगठनों ने बढ़ाई निगरानी
मामले को लेकर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन सक्रिय हो गए हैं। सहसंयोजक उमेश सेन ने बताया कि संगठन लगातार इन गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाई जा रही है। उनका कहना है कि शहर की सामाजिक समरसता को बिगाड़ने वाली किसी भी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कलेक्टर से हो चुकी है शिकायत
संगठनों द्वारा इस मामले की शिकायत कलेक्टर को भी की जा चुकी है। ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन से मांग की गई है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर उचित कार्रवाई की जाए। शिकायत में यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है।
शहर की फिजा पर असर की आशंका
बालोद को हमेशा शांत और सौहार्दपूर्ण शहर के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन इस तरह के आरोपों से सामाजिक ताने-बाने पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। लोगों का कहना है कि किसी भी तरह की जबरन या प्रलोभन आधारित गतिविधियां समाज में विभाजन पैदा कर सकती हैं।
जांच और कार्रवाई की मांग तेज
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इन आरोपों की गंभीरता से जांच कर सच्चाई सामने लाएगा। सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने मांग की है कि मामले में पारदर्शी जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि शहर की शांति और सौहार्द बना रहे।
गलत तरीके से धर्मांतरण को लेकर है छत्तीसगढ़ में सख्त नियम
ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए मार्च 2026 में “छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026” पारित किया गया है, जो 1968 के पुराने कानून का स्थान लेता है। यह कानून जबरन, धोखाधड़ी, प्रलोभन या डिजिटल माध्यम से किए गए धर्मांतरण को संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध बनाता है। सामूहिक धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास और न्यूनतम ₹25 लाख का जुर्माना हो सकता है। सामान्य अवैध धर्मांतरण के लिए 7 से 10 वर्ष तक की जेल और कम से कम ₹5 लाख का जुर्माना है। नाबालिग, महिला, मानसिक रूप से अस्वस्थ, SC, ST या OBC समुदायों के मामले में सजा 10 से 20 वर्ष तक हो सकती है, साथ ही न्यूनतम ₹10 लाख का जुर्माना। सामूहिक धर्मांतरण में दो या दो से अधिक व्यक्तियों का अवैध रूप से धर्मांतरण कराने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और ₹25 लाख तक का जुर्माना हो सकता है। वहीं केवल विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण अवैध माना जाएगा जब तक कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न किया गया हो। धर्मांतरण करने से पहले जिला मजिस्ट्रेट को घोषणा पत्र देना अनिवार्य है। यह कानून राज्य में आदिवासी हितों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के उद्देश्य से लाया गया है।

