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IIT भिलाई में गूंजा संयुक्ता पाढ़ी का शोधनाद : शोधपत्र प्रस्तुति के साथ बनीं सत्राध्यक्ष, पंडवानी–तीजन बाई पर शोध से राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की पहचान

दुर्ग/बालोद स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय की अंग्रेजी विभागाध्यक्ष श्रीमती संयुक्ता पाढ़ी ने एक बार पुनः अपने शोध–कौशल का परचम राष्ट्रीय पटल पर लहराया। इस बार प्रतिष्ठित संस्थान IIT भिलाई के डिपार्टमेंट ऑफ लिबरल आर्ट्स द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में उनका शोधनाद दोहरी गरिमा से युक्त रहा—वे जहाँ एक ओर शोधार्थी के रूप में अपना शोधपत्र प्रस्तुत कर रही थीं, वहीं दूसरी ओर सत्राध्यक्ष के रूप में अकादमिक विमर्श का संचालन भी कर रही थीं, जो उनके लिए तथा महाविद्यालय के लिए गौरव का विषय रहा।

“Gendered Modalities of Remembering in South Asian Literatures” शीर्षक से प्रस्तुत अपने शोधपत्र में संयुक्ता ने छत्तीसगढ़ की लोकधरोहर पंडवानी तथा उसे वैश्विक पहचान प्रदान करने वाली लोकनायिका तीजन बाई के अलौकिक व्यक्तित्व को राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया। प्रस्तुति से पूर्व वे तीजन बाई के पैतृक निवास जाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर आईं। अस्वस्थता के बावजूद तीजन बाई ने उन्हें स्नेहिल आशीर्वचन प्रदान किए।

अपने शोध में संयुक्ता ने उस ऐतिहासिक सत्य को रेखांकित किया कि एक समय स्त्रियों को पंडवानी के मंच पर प्रस्तुति का अधिकार नहीं था। एक शोधार्थी द्वारा यह जिज्ञासा प्रकट की गई कि “क्या तीजन बाई का तंबूरा धारण करना उनके स्त्री स्वरूप में किसी पुरुषोचित भाव का संकेत है?” इस पर संयुक्ता ने प्रभावपूर्ण उत्तर देते हुए कहा कि तीजन बाई का तंबूरा आक्रामकता का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सृजन–शक्ति का प्रतीक है। जब वे महाभारत का गायन करती हैं, वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता है तो कभी अर्जुन का गांडीव—अर्थात उन्होंने परंपरा की सीमाओं को लांघकर स्त्री–अस्मिता को स्वर प्रदान किया है।

इस अवसर पर आमंत्रित अतिथि राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता मनोज वर्मा की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष आयाम प्रदान किया। उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म भूलन का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार उसमें छत्तीसगढ़ के गाँवों की छोटी–छोटी लोक–परंपराएँ, ग्रामीण जीवन की सहजता, बोली–बानी, सामाजिक संवेदनाएँ और लोकविश्वासों को सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है।

चर्चा के दौरान संयुक्ता ने मनोज वर्मा के साथ छत्तीसगढ़ की पारंपरिक मड़ई में पूजित देवताओं और फिल्म कांतारा में दर्शाए गए देव–स्वरूप के बीच तुलनात्मक विमर्श किया। यह चर्चा केवल लोक–आस्था और सिनेमा की तुलना नहीं, बल्कि लोकधर्म, सांस्कृतिक स्मृति और दृश्य–माध्यमों के माध्यम से जीवित परंपराओं के पुनर्पाठ पर एक गहन संवाद था।

इसके अतिरिक्त संयुक्ता ने “Remembering Vulnerability and Cast(e)ing Identity” सत्र की अध्यक्षता भी की, जिसमें IIT रुड़की, IIT तिरुपति तथा मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान भोपाल के शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
निस्संदेह, यह उपलब्धि स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण क्षण सिद्ध हुई और श्रीमती संयुक्ता पाढ़ी के शैक्षिक अवदान का एक और उज्ज्वल अध्याय बन गई।

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