Balod Times

❝क्या बालोद में मर चुकी है मानवता? निर्वस्त्र विक्षिप्त महिला की पीड़ा पर समाज रहा मूकदर्शक❞

बालोद
जब मानवता संवेदना की सीमा लांघकर बेशर्मी में बदल जाए, तब यह कहना गलत नहीं होगा कि हम कलयुग के सबसे कड़वे सच से रूबरू हैं। ऐसा ही एक शर्मनाक और पीड़ादायक दृश्य बालोद जिला मुख्यालय के बस स्टैंड में देखने को मिला, जहाँ पिछले कई वर्षों से एक विक्षिप्त वृद्ध महिला भीख मांगकर जीवन यापन कर रही थी।

बीते कुछ दिनों से वह महिला अपने वस्त्र भी त्याग चुकी थी और निर्वस्त्र अवस्था में पूरे बस स्टैंड परिसर में भटकती रही, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि किसी राहगीर, दुकानदार या जिम्मेदार नागरिक की आँखों में मानवता की झलक तक नजर नहीं आई। भीड़ रोज गुजरती रही, नजरें फेरती रहीं, लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।

इस अमानवीय स्थिति ने तब सबको झकझोरा जब बस स्टैंड में रोज खबरों के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की नजर उस महिला पर पड़ी। पत्रकारों ने तुरंत साड़ी मंगवाकर महिला को पहनाई और प्रशासन को सूचना दी।

सूचना मिलते ही तहसीलदार आशुतोष शर्मा मौके पर पहुंचे। महिला की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने जिला अस्पताल के सिविल सर्जन से संपर्क किया, लेकिन दुर्भाग्यवश यहाँ भी संवेदनशीलता की जगह नियमों की दुहाई दी गई और उन्हें 108 में कॉल करने की सलाह देकर पल्ला झाड़ लिया गया।

इसके बाद तहसीलदार ने नगर पालिका से संपर्क किया, जहाँ से एम्बुलेंस के बजाय कचरा गाड़ी भेज दी गई, जिसने पूरे मामले को और भी शर्मनाक बना दिया।

हालात तब बदले जब पत्रकारों ने जिला न्यायालय की विधिक सेवा सचिव जज भारती कुलदीप को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। सूचना मिलते ही जज स्वयं मौके पर पहुंचीं और जिला अस्पताल से एम्बुलेंस की व्यवस्था करवाई। जज का फोन लगते ही मात्र 10 मिनट में एम्बुलेंस मौके पर पहुंची, और विक्षिप्त महिला को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जज भारती कुलदीप ने बताया कि महिला का पूरा चिकित्सकीय इलाज कराया जाएगा और मेडिकल प्रतिवेदन तैयार कर उसे बिलासपुर स्थित सेंद्री मानसिक स्वास्थ्य संस्थान भेजा जाएगा।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने समाज और प्रशासन दोनों के सामने एक कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है—
जब यह महिला कई दिनों से निर्वस्त्र अवस्था में सार्वजनिक स्थान पर घूम रही थी, तब समाज क्या कर रहा था?

क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि किसी बेसहारा महिला की पीड़ा हमें विचलित तक नहीं करती?

यह घटना केवल एक विक्षिप्त महिला की नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवेदनहीनता का आईना है।

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