बालोद। बालोद निवासी बालोद की बहू और वर्तमान में स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय भिलाई में अंग्रेजी विभाग की विभाग अध्यक्ष के रूप में कार्यरत संयुक्ता पाढ़ी के शोध पत्र का बीते दिनों भुवनेश्वर उड़ीसा में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की प्रथम धर्म अध्ययन सम्मेलन में प्रस्तुतीकरण हुआ। जिसमें उनके शोध को काफी सराहना मिली। संयुक्ता पाढ़ी के इस शैक्षणिक और बौद्धिक योगदान से बालोद शहर का नाम भी रोशन हुआ है। ज्ञात हो कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, आईआईटी भुवनेश्वर में संपूर्ण भारत स्तर पर आयोजित प्रथम धर्म अध्ययन सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन का उद्देश्य धर्म, संस्कृति, नैतिकता, परंपरा तथा समकालीन संदर्भों में सनातन चिंतन को अकादमिक विमर्श के माध्यम से प्रस्तुत करना था। इस गरिमामय सम्मेलन में आईआईटी भुवनेश्वर सहित देश के विभिन्न आईआईटी संस्थानों के निदेशक, साथ ही भारत के लगभग सभी प्रमुख शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों के शीर्ष पदाधिकारी, विद्वान शिक्षाविद एवं शोधार्थी सम्मिलित हुए थे। सम्मेलन में देश–विदेश से आए प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए अपने-अपने शोध–पत्र प्रस्तुत किए, जिससे यह आयोजन एक राष्ट्रीय बौद्धिक संगम के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि प्रभु श्री गौरांग दास जी, अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सनातन चिंतक, इस्कॉन भिक्षु एवं प्रेरक वक्ता रहे। अपने उद्बोधन में उन्होंने धर्म को केवल आस्था तक सीमित न मानकर उसे जीवन–मूल्यों, करुणा तथा सहअस्तित्व की व्यापक परंपरा के रूप में समझने पर बल दिया। सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने सनातन परंपरा, दर्शन, सांस्कृतिक निरंतरता तथा आधुनिक संदर्भों में धर्म की भूमिका पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। इस अवसर पर संयुक्ता पाढ़ी विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग, स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय, ने अपना शोध–पत्र प्रस्तुत किया, जिसका विषय था— “सनातन धर्म के पवित्र बंधन: आस्था, प्रतीकात्मकता एवं उपासना के आख्यानों में पशु-जगत की भूमिका। अपने शोध–प्रस्तुतीकरण में उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि सनातन धर्म की मूल विशेषता यह है कि उसमें केवल मानव अधिकारों और मानवीय मूल्यों की ही चर्चा नहीं की गई है, बल्कि पशु-जगत को भी समान नैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया गया है।“ संयुक्ता पाढ़ी ने अपने शोध को सशक्त बनाने हेतु पंचतंत्र एवं जातक कथाओं पर आधारित अनेक सारगर्भित उद्धरण प्रस्तुत किए और यह स्पष्ट किया कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में पशु केवल कथात्मक पात्र नहीं, बल्कि धर्म, नीति, करुणा और सहअस्तित्व के संवाहक रहे हैं। उनके प्रस्तुतीकरण को सम्मेलन के अध्यक्षमंडल एवं उपस्थित विद्वानों द्वारा अत्यंत विद्वतापूर्ण, मौलिक एवं विचारोत्तेजक बताते हुए विशेष रूप से सराहा गया। विद्वानों ने कहा कि यही सनातन धर्म की विशिष्टता है कि वह मानव और पशु-जगत के बीच समरसता एवं संतुलन की भावना को केंद्र में रखता है। यह सम्मेलन धर्म अध्ययन के क्षेत्र में अकादमिक संवाद, नवीन शोध-दृष्टियों तथा वैचारिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।

और भी है संयुक्ता की कई खास उपलब्धियां
भिलाई में स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय में पदस्थ संयुक्ता राष्ट्रीय सेवा योजना (एन.एस.एस) की कार्यक्रम अधिकारी का दायित्व भी निर्वहन कर रही हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां भी हासिल की है। जैसे अंतरराष्ट्रीय युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। इसी तरह राष्ट्रीय एकता शिविर में नेतृत्व की है। जिसमें पश्चिम बंगाल में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में छत्तीसगढ़ दल की कंटिंजेंट लीडर के रूप में नेतृत्व की है, जिसमें छत्तीसगढ़ टीम विजेता बनी। इसके अलावा आयोजन समिति में भी उनकी सहभागिता रही है। जैसे राजनांदगांव में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर की आयोजन समिति की सदस्य रही हैं।
पुस्तक लेखन एवं संपादन
वर्ष 2024 में उन्होंने रामायण: एक जीवंत महाकाव्य – भाग 1 (हिंदी),Ramayan: Beyond The Epic – Part 1 (अंग्रेज़ी) का संकलन एवं संपादन किया है। वर्ष 2026 में इन पुस्तकों का दूसरा भाग प्रकाशित होने वाला है। साथ ही सनातन धर्म पर आधारित पुस्तक सनातन दिग्विजय यात्रा भी शीघ्र प्रकाशनाधीन है। उनकी वर्ष 2025 में बी.एड. की एक पुस्तक, एम.एड. की एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।
अंग्रेज़ी साहित्य की हैं शोधार्थी
शोध क्षेत्र की बात करे तो वे अंग्रेज़ी साहित्य की शोधार्थी हैं। उनका शोध भारतीय पौराणिक कथाओं, सनातन धर्म एवं हिंदुत्व आधारित वैचारिक परंपराओं पर केंद्रित है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति, पौराणिक गाथाओं, तथा विशेष रूप से रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों पर इनके अनेक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं एवं संगोष्ठियों में प्रकाशित हो चुके हैं। तीन बार आईआईटी रुड़की में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP),भारत की सभ्यता एवं संस्कृति जैसे विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत कर चुकी हैं।

