बालोद टाइम्स
बालोद। नगर निगम और स्कूल प्रशासन के बीच पटेल मैदान (डंप साइट/स्कूल जमीन) को लेकर चल रहा विवाद अब प्रशासनिक दबाव और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के उल्लंघन का गंभीर मामला बनता दिख रहा है। 17 जुलाई से 31 जुलाई के बीच घटे घटनाक्रम और जारी दस्तावेजों ने निकाय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।
1. सामूहिक असहमति को दरकिनार कर जारी हुई एनओसी
गत 17 जुलाई 2026 को शाला विकास एवं प्रबंधन समिति (SMC) के सदस्यों और प्रधान पाठक ने संयुक्त रूप से मैदान को बचाने के लिए एक कड़ा असहमति पत्र जारी किया था। इस पत्र पर समिति के कई सदस्यों के नाम और हस्ताक्षर दर्ज थे, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि वे जमीन के किसी भी अन्य उपयोग या अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने का समर्थन नहीं करते।
हालांकि, महज 14 दिनों के भीतर 31 जुलाई को उसी प्रधान पाठक ने अकेले अपने स्तर पर एनओसी जारी कर दी। इस नई एनओसी में न तो शाला प्रबंधन समिति का कोई उल्लेख है और न ही किसी सदस्य के हस्ताक्षर।
2. बाह्य प्रशासनिक दखल और दबाव की आशंका
एक लोकतांत्रिक समिति के सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय को दरकिनार कर प्रधान पाठक द्वारा अकेले अपने लेटरहेड पर पत्र जारी करना, स्पष्ट रूप से बाह्य प्रशासनिक दखल और उच्च अधिकारियों के दबाव की ओर इशारा करता है।
3. पत्र में हाथ से जोड़ा गया ‘बचाव नोट’
31 जुलाई के एनओसी पत्र की सबसे संदिग्ध बात उसमें हाथ से अलग से जोड़ा गया एक नोट है। विश्लेषकों और समिति सदस्यों का मानना है कि पत्र जारी करने वाले अधिकारी पर ऊपर से एनओसी देने का भारी दबाव था। अपने प्रशासनिक बचाव और भविष्य की जवाबदेही से बचने के लिए ही अधिकारी ने अंतिम समय में हाथ से ये शर्तें जोड़ीं।
4. मूल फाइल टीएस डंप साइट की, फिर स्कूल जमीन पर पत्राचार क्यों?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब मूल फाइल और तकनीकी स्वीकृति (TS) डंप साइट की जमीन के लिए थी, तब निकाय प्रशासन द्वारा स्कूल की जमीन को लेकर पत्राचार क्यों किया जा रहा था? यह तथ्य साबित करता है कि निकाय प्रशासन किसी भी तरह पटेल मैदान पर काम शुरू कराने के लिए स्कूल प्रबंधन पर लगातार दबाव बना रहा था।
समिति के सदस्यों और स्थानीय नागरिकों ने इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच और पटेल मैदान के संरक्षण की मांग की है।


